ये न मुख्य पात्र की मृत्यु है और न ही उस सुपात्र की 

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‘बाघ बहादुर’ और ‘अंधी गली’ दोनों ही वह कृतियां, जिन्हें देखते समय आप किसी से शर्त लगा सकते हैं कि वह स्क्रीन से नजर नहीं हटा सकेगा। बशर्ते, कि वह सिनेमा की श्रेष्ठता को ‘शोले’ या ‘मुगले-आजम’ तक ही समझने के दिमागी अतिक्रमण से मुक्त हो।

वक्त मुझे बहुत पीछे खींचकर ले जा रहा है। फिर भी मैं नॉस्टेल्जिक नहीं हो रहा। एक दर्द है। जिसके एक्सप्रेशन को बताने के लिए मुझे यूं अतीत को अपनी तरफ खींचना पड़ रहा है। ये भूमिका बांधते समय मैं किसी छद्म लेखकीय उत्कृष्टता के गौरव की आत्म-रति में भी नहीं डूबा हुआ हूँ। और जब यह लिख रहा हूँ, उस समय की न तो शाम सुरमई है और न ही वह मेरे तई सुरामयी है।

बुद्धदेब दासगुप्ता (Buddhdeb Dagsupta) नहीं रहे। पश्चिम बंगाल से ज्यादा वाकफियत न रखने वाले  लोगों में से शायद इक्का-दुक्का ही जानते होंगे कि मैं किस की बात कर रहा हूँ। इसलिए मुझे अतीत में जाना पड़ रहा है। नॉस्टेल्जिक होने से अलग रहते हुए भी  मुझे उस समय की याद किसी जरूरत की तरह आ रही है, जब देश में छोटे परदे के नाम पर दूरदर्शन का एकाधिकार हुआ करता था। यदि आज भी उस दौर का वही इकलौता चैनल यदि होता, तो वह जरूर अपनी एक खूबसूरत रवायत निभाता। दासगुप्ता की फिल्म ‘बाघ बहादुर’ (Bagh Bahadur) या ‘अंधी गली’ (Andhi Gali) का दोबारा प्रदर्शन करता। और फिर वो तबका भी ये महसूस कर पाता कि इस गुरूवार ने हमसे किसे छीन लिया है। बांग्ला फिल्मों के इस जादूगर ने शायद केवल ‘अंधी गली’ के जरिये ही हिंदी सिनेमा को भी नवाजा। लेकिन ‘बाघ बहादुर’ और ‘अंधी गली’ दोनों ही वह कृतियां, जिन्हें देखते समय आप किसी से शर्त लगा सकते हैं कि वह स्क्रीन से नजर नहीं हटा सकेगा। बशर्ते, कि वह सिनेमा की श्रेष्ठता को ‘शोले’ (Sholay) या ‘मुगले-आजम’ (Mughale-Azam) तक ही समझने के दिमागी अतिक्रमण से मुक्त हो।

‘बाघ बहादुर’ को देखना एक ऐसा अनुभव है, जो आपको स्थाई रूप से प्रभावित करने की ताकत रखता है। मुख्य अदाकार के तौर पर पवन मल्होत्रा (Pavan Malhotra)और अर्चना (Archana- South Indian Actress)। मुझे पूरा यकीन है कि इस फिल्म के पूरा हो जाने के बाद इन दोनों कलाकारों ने उस पूरी अवधि और अनुभव के लिए अपने जीवन को सार्थक मान लिया होगा। छोटी से कहानी, बहुत बड़ा सन्देश। बीते हुए दौर का किस्सा, आने वाले कई पीढ़ियों को आइना दिखाने का माद्दा। दासगुप्ता कैमरे के पीछे हैं, लेकिन सामने भी जैसे उनके अलावा और कोई है ही नहीं। समाज में हिंसा के किसी आदत में तब्दील होते स्वीकार्य वाले कंट्रास्ट को दासगुप्ता ने इस चित्र में जैसे दिखाया, वह भीतर तक झकझोर कर रख देता है। पत्थर तोड़ने वाला एक मजदूर उस बहुत बड़ी चट्टान से हार रहा है, जो उसकी परम्परा को अपने पीछे कहीं छिपा चुकी है। ठेठ देहाती इलाके में त्यौहार पर बाघ बनकर प्राचीन कला और आस्था को जीवित रखने का उसका जुनून आपको गर्व से नहीं, बल्कि उस भाव से भर देता है, जिसे द्रवित होना कहते हैं। वो प्रेयसी, जो जमाने की रफ़्तार में बहुत पीछे धकेले जाते अपने प्रेमी और स्वयं उसे अपनी तरफ खींचते समय के बीच जद्दोजहद कर रही है। ढोल के तौर पर अपने परंपरागत और पेशागत गर्व को सहेजे रखने का प्रयास कर रहा बुजुर्ग। एक वास्तविक बाघ, जिसे दासगुप्ता इंसानी फितरत के क्रूर बदलाव के प्रतीक के तौर पर अद्भुत ख़ूबसूरती के साथ परदे पर उतार देते हैं। वह रिंग मास्टर, जिसके हाव-भाव और दंभ यह चुगली करने में साकार रूप से सक्षम हैं कि इस दुनिया के एक्चुअल तत्वों पर किस तरह विर्तुअलिटी का आडम्बर सफलतापूर्वक पहनाया जा सकता है।  चित्र के अंत में बाघ बहादुर और बाघ के बीच की वह लड़ाई किसी साउंड इफ़ेक्ट से रोमांचक नहीं बनी। उसमें टाइगर के खूंखार चेहरे को बार-बार परदे पर लाकर दर्शकों को डराने का प्रयास नहीं किया गया। न ही यह हुआ कि बाघ बहादुर के शरीर पर बने असंख्य घाव दिखा-दिखाकर उसके लिए दर्शकों की सहानुभूति जुगाड़ने के हथकंडे अपनाये गए। पूरी फिल्म में किसी भी स्तर पर इस तरह का कोई भी काम नहीं हुआ। फिर भी जब स्क्रीन पर इस चित्र के समाप्त होने की बात दिखती है तो आप सिहर उठते हैं। यह सोचकर कि ये अंत नहीं, बल्कि उस शुरूआत का मामला है, जो हम सभी को, हमारी आने वाली असंख्य  नस्लों को दहला रही है। बता रही है कि हम उस बाघ के तौर पर अपने-अपने जीवन में हिंसा को स्वीकारने के अभिशाप से पूरी तरह घिर चुके  हैं। फिल्म के अंत में चट्टान पर बहता बाघ बहादुर का खून और बगल में खड़ा होकर ढोल बजाता वह बुजुर्ग आपके रोंगटे खड़े कर देते हैं। वे यह चेतावनी देते हैं कि हम खुद या अपनों के रक्त से घिरी जमीन पर बसी दुनिया में हैं और इन हालात के खिलाफ हमें जगाये रखने के लिए लगातार ढोल का शोर किया जाना बहुत बड़ी अनिवार्यता बन गया है। हमारे बीच वैचारिक और शारीरिक क्रूरता के जो घटनाक्रम अब महज समाचार बन चुके हैं, उन सभी के विषाणुओं की उत्पत्ति को समझना हो तो ‘बाघ बहादुर’ उसका सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।

‘बाघ बहादुर’ बेशक बांग्ला में बनी है, लेकिन फिर भी आप उसे देखिये। क्योंकि उसके सन्देश, अभूतपूर्व उत्कृष्टता और अकल्पनीय कथानक/निर्देशन को समझने में भाषाई बाध्यता कहीं भी आड़े नहीं आती है। यह चित्र  देखने के बाद आप  शायद समझ सकेंगे कि समाचार माध्यमों में न के बराबर की जगह पाने वाली एक मृत्यु किस तरह एक समूचे युग का अवसान है। फिलहाल ‘अंधी गली’ की बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ। क्योंकि अब उस गली से बाहर निकलने का मार्ग तलाशने का समय है, जो गली समूची मानवता को अमानवीयता के अँधेरे की तरफ खींचे लिए जा रही है। उस गली की बात को अपनी कलम और कैमरे से सामने ला देने वाले बुद्धदेब दासगुप्ता को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। मेरे विचारों में न तो कभी बाघ बहादुर का मुख्य पात्र मरा है और न ही कभी निधन होगा उन सुपात्र दासगुप्ता का, जो शरीर के तौर पर अब हमारे बीच नहीं रहे हैं।

  • रत्नाकर त्रिपाठी
    बीते 35 वर्ष से लगातार पत्रकारिता तथा लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में जन्मे एवं पले-बढ़े रत्नाकर ने इसी प्रदेश को अपनी कर्मभूमि भी बनाया है। वह दैनिक भास्कर और पत्रिका सहित ईटीवी (वर्तमान नाम न्यूज 18) राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ एवं पीपुल्स समाचार में भी महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दे चुके हैं। त्रिपाठी को लेखन की विशिष्ट शैली के लिए खास रूप से पहचाना जाता है। उन्हें आलेख सहित कहानी, कविता, गजल, व्यंग्य और राजनीतिक तथा सामाजिक विषयों के समीक्षात्मक लेखन में भी महारत हासिल है। उनके लेखन में हिन्दू सहित उर्दू और अंग्रेजी के कुशल संतुलन की विशिष्ट शैली काफी सराही जाती है। संप्रति में त्रिपाठी मध्यप्रदेश सहित छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश के न्यूज चैनल ‘अनादि टीवी’ के न्यूज हेड के तौर पर कार्यरत हैं।





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