Collegium System: कॉलेजियम की सिफारिशों पर समय से फैसले ले सरकार, जी न्यूज से बोले पूर्व CJI यूयू ललित

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Supreme Court:  आठ नवंबर को चीफ जस्टिस के पद से सेवानिवृत्त हुए जस्टिस उदय उमेश ललित ने ज़ी मीडिया संवाददाता अरविंद सिंह से ख़ास बातचीत की. ज़ी मीडिया से बातचीत में  जस्टिस ललित ने माना कि कॉलेजियम की सिफारिश पर सरकार की ओर से फैसले समय से होने चाहिए वरना कई बार सरकार की ओर से देरी होने पर योग्य व्यक्ति के द्वारा अपना नाम वापस ले लिया जाता है और न्यायपालिका एक जज के तौर पर काबिल शख्स की योग्यता से वंचित रह जाती है.

कर्नाटक के वकील का उदाहरण दिया
जब सिफारिशों पर सरकार की ओर से हो रही देरी पर सवाल उठाने वाले जस्टिस सजंय किशन कौल के शुक्रवार के आदेश के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने कर्नाटक के एक युवा, बेहद काबिल वकील का उदाहरण दिया, जिनकी हाईकोर्ट के जज के तौर पर नियुक्ति की सिफारिश हाईकोर्ट कॉलेजियम ने भेजी. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने भी उसे आगे बढ़ाया लेकिन सरकार ने उस सिफारिश को करीब एक साल तक पेंडिंग रखा और आखिरकार उस वकील ने कॉलेजियम को पत्र लिखकर जज के तौर पर नियुक्ति के लिए अपनी सहमति ही वापस ले ली.

जस्टिस ललित ने कहा कि चूंकि कॉलेजियम की सिफारिश पर सरकार ने हां या ना में कोई फैसला ही नहीं लिया तो जाहिर है, उनका संयम ही टूट गया और उन्होंने जज के तौर अपनी सहमति को वापस ले लिया. लिहाजा न्यायिक व्यवस्था एक काबिल विद्वान व्यक्ति से वंचित रह गई. इसलिए मन में आता है कि एक समय सीमा होनी चाहिए जिसमें सरकार को फैसला लेना चाहिए. जस्टिस कौल ने भी इसी संदर्भ में बात कही है.

क़ानून मंत्री का मत उनकी निजी राय, संवाद ज़रूरी
जब जस्टिस ललित से कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल उठाने वाले कानून मंत्री किरण रिजिजू के हाल ही में दिए बयान पर पूछा गया तो जस्टिस ललित ने ज़ी मीडिया से कहा कि ये उनका व्यक्तिगत मत है, क्योंकि आप देखिए, कॉलेजियम सिस्टम में पांच जजो की बेंच का फैसला होता है. स्थापित प्रकिया के तहत कॉलेजियम काम करता है. अगर आपको कॉलेजियम सिस्टम में सुधार चाहिए तो शायद संवाद की जरूरत है. बेहतर होगा कि दोनों पक्ष ( सरकार, न्यायपलिका) के बीच  संवाद हो.
 

फैसले के कानूनी पहलुओं की आलोचना हो, जजों की व्यक्तिगत नहीं
छावला रेप केस में जस्टिस ललित की अध्यक्षता वाली बेंच ने तीन दोषियों को सन्देह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था. इसके अलावा भी सोशल मीडिया पर यदा कदा  जजों  को टारगेट करने का ट्रेंड चलता रहता है. इस पर जस्टिस ललित से जब पूछा गया तो उन्होंने ज़ी मीडिया से कहा कि सोशल मीडिया के अपने लाभ – नुकसान है. जहां तक मेरा व्यक्तिगत सवाल है कि मैं सोशल मीडिया पर नहीं हूं. इसलिए मुझे कमेंट्स से फर्क नहीं पड़ता. लेकिन मुझे लगता है  कि लोगों को थोड़ा सा संयम बरतने की ज़रूरत है. तुंरत जो टिप्पणी करते हैं, वो शायद ग़लत है. कई बार शायद सीमा पार हो जाती है. आलोचना दायरे में होना चाहिए. आप फैसले की आलोचना कर सकते है, पर जजों की आलोचना नहीं. क़ानून के छात्र के तौर पर आप फैसले के कानूनी पहलुओं पर आलोचना कर सकता है. पर इस तरह के कमेंट नहीं दिखाई देते है.

कोई मलाल नहीं है
चीफ जस्टिस के तौर पर जस्टिस यू यू ललित का कार्यकाल 74 दिन का रहा. पर इस दरमियान 10 हज़ार से ज़्यादा केस का सुप्रीम कोर्ट ने निपटारा किया. यहीं नहीं,इस दौरान छह संविधान पीठ का गठन हुआ. जस्टिस ललित से जब पूछा गया कि क्या इतने छोटे कार्यकाल में कुछ न कर पाने का उन्हें मलाल है तो उन्होंने कहा कि मुझे कोई मलाल नहीं है. जो कार्यकाल रहा, जितना मुझे मौका मिला ,उस अवसर को एक सुनहरा मौका बनाकर उसका फायदा उठाना , उसका इस्तेमाल संस्थान के हित में करना,जहां तक मैं कर सकता था, मैंने कर लिया. मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूं.

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