Jai Hind: ‘सीधे खड़ी होओ और जय हिंद कहो’, INA की लेफ्टिनेंट को नेताजी ने लगाई थी यह फटकार

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस (फाइल फोटो)
– फोटो : Twitter

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 देश की आजादी की लड़ाई के अनेक गुमनाम नायकों में से एक हैं आशा सेन। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित आजाद हिंद फौज या इंडियन नेशनल आर्मी (INA) में लेफ्टिनेंट भारती ‘आशा’ चौधरी के रूप में भी जानी जाती हैं। उन्हें नेताजी ने फटकार लगाते हुए कहा था, ‘सीधे खड़ी होओ और जय हिंद कहो’। नेताजी की यह फटकार अब आशा सेन की आत्मकथा पढ़ने वालों के कानों में गूंजेगी। 

1928 में जापान में जन्मीं आशा सेन अब 94 साल की हैं और पटना में अपने बेटे के साथ रहती हैं। स्वतंत्रता सेनानी आशा सेन की यह मूल आत्मकथा ‘आशा सेन की सुभाष डायरी’ शीर्षक से  हिंदी में लिखी गई थी और 1992 में पारिजात प्रकाशन ने छापी थी। अब इसका अंग्रेजी संस्करण हार्पर कॉलिंस ने प्रकाशित किया है। 

हार्पर कॉलिंस प्रकाशन ने ‘द वॉर डायरी आफ आशा-सेन : फ्रॉम टोक्यो टू नेताजीज इंडियन नेशनल आर्मी’ (The War Diary of Asha-San: from Tokyo to Netaji’s Indian National Army) शीर्षक से प्रकाशित की गई है। इसमें जापान में जन्मीं भारतीय स्वतंत्रता सेनानी के जीवन की कई यादगार बातों का वर्णन है। 250 पृष्ठों की इस पुस्तक में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी की झांसी रेजिमेंट में एक युवा सैनिक से लेकर लेफ्टिनेंट बनने तक के आशा सेन के सफर का जिक्र है। 

इस आत्मकथा के माध्यम से आशा सहाय चौधरी पाठकों को आजाद हिंद फौज की टोक्यो और थाईलैंड के जंगलों की यात्रा का ब्योरा देती हैं। वह बताती हैं कि कैसे उन्होंने राइफल पकड़ना सीखा और अंग्रेजों के राज के खिलाफ जंग के अपने मिशन को अंजाम दिया। तन्वी श्रीवास्तव ने आशा सेन की इस आत्मकथा का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। समाचार एजेंसी एएनआई से चर्चा में आशा सेन ने आजाद हिंद फौज से जुड़े कई किस्सों का जीवंत वर्णन किया। 

बैंकॉक से रंगून तक पैदल मार्च किया
आशा सेन ने बातचीत में 1943 में आईएनए में अपने चार महीने के प्रशिक्षण और बैंकॉक से रंगून तक लंबे पैदल मार्च का स्मरण किया। यह अक्सर खतरों से भरा रहता था। उन्होंने बताया कि मुझे बचपन से ही रोज डायरी लिखने का शौक था। स्कूल और कॉलेज के दौरान भी मैं हर दिन अपनी डायरी  लिखती थी। आशा सेन ने कहा, ‘मैं सिर्फ 16 साल की थी जब मैं आईएनए में शामिल हुई थीं। एक साल बाद ही मैं लेफ्टिनेंट पद तक पहुंच गई थी। हमने प्रशिक्षण के दौरान बंदूकें, पिस्तौल और विमान भेदी मिसाइल चलाना सीखा।’

झांसी रेजिमेंट में इसलिए भर्ती हुईं
स्वतंत्रता सेनानी ने बताया कि जब भी बी-29 अमेरिकी विमान हमारे क्षेत्र में बमबारी के लिए आते तो हम उन पर गोलियां चलाते थे। यह पूछे जाने पर कि वह आजाद हिंद फौज की ‘झांसी की रानी रेजिमेंट’ में ही क्यों शामिल हुईं? उन्होंने कहा, ‘हम बलिदान की भावना से ओत-प्रोत होकर ही बड़े हुए हैं। हम देश की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान करने के लिए तैयार और इच्छुक थे। जब झांसी की रानी रेजिमेंट को बैंकॉक में रखा गया था, तब मैंने अपने पिता से कहा कि वह इस रेजिमेंट में शामिल होना चाहती हैं। नेताजी के जर्मनी से लौटने के बाद उन्होंने मुझे सेना में शामिल होने की अनुमति दी।’

पैर छूने पर नेताजी ने उन्हें फटकारा था
वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी आशा सेन ने एक किस्सा साझा करते हुए कहा कि नेताजी ने उन्हें और उनके साथियों को उनके पैर छूने और झुकने के लिए फटकार लगाई थी। सेन ने कहा कि जैसे ही हम नेताजी के पैर छूने के लिए झुके तो उन्होंने गुस्से में कहा, ‘हमने लंबे समय तक गुलामी झेली है और फिर भी आप …, सीधे खड़े हो जाओ और जय हिंद कहो’

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 देश की आजादी की लड़ाई के अनेक गुमनाम नायकों में से एक हैं आशा सेन। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित आजाद हिंद फौज या इंडियन नेशनल आर्मी (INA) में लेफ्टिनेंट भारती ‘आशा’ चौधरी के रूप में भी जानी जाती हैं। उन्हें नेताजी ने फटकार लगाते हुए कहा था, ‘सीधे खड़ी होओ और जय हिंद कहो’। नेताजी की यह फटकार अब आशा सेन की आत्मकथा पढ़ने वालों के कानों में गूंजेगी। 

1928 में जापान में जन्मीं आशा सेन अब 94 साल की हैं और पटना में अपने बेटे के साथ रहती हैं। स्वतंत्रता सेनानी आशा सेन की यह मूल आत्मकथा ‘आशा सेन की सुभाष डायरी’ शीर्षक से  हिंदी में लिखी गई थी और 1992 में पारिजात प्रकाशन ने छापी थी। अब इसका अंग्रेजी संस्करण हार्पर कॉलिंस ने प्रकाशित किया है। 

हार्पर कॉलिंस प्रकाशन ने ‘द वॉर डायरी आफ आशा-सेन : फ्रॉम टोक्यो टू नेताजीज इंडियन नेशनल आर्मी’ (The War Diary of Asha-San: from Tokyo to Netaji’s Indian National Army) शीर्षक से प्रकाशित की गई है। इसमें जापान में जन्मीं भारतीय स्वतंत्रता सेनानी के जीवन की कई यादगार बातों का वर्णन है। 250 पृष्ठों की इस पुस्तक में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी की झांसी रेजिमेंट में एक युवा सैनिक से लेकर लेफ्टिनेंट बनने तक के आशा सेन के सफर का जिक्र है। 

इस आत्मकथा के माध्यम से आशा सहाय चौधरी पाठकों को आजाद हिंद फौज की टोक्यो और थाईलैंड के जंगलों की यात्रा का ब्योरा देती हैं। वह बताती हैं कि कैसे उन्होंने राइफल पकड़ना सीखा और अंग्रेजों के राज के खिलाफ जंग के अपने मिशन को अंजाम दिया। तन्वी श्रीवास्तव ने आशा सेन की इस आत्मकथा का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। समाचार एजेंसी एएनआई से चर्चा में आशा सेन ने आजाद हिंद फौज से जुड़े कई किस्सों का जीवंत वर्णन किया। 

बैंकॉक से रंगून तक पैदल मार्च किया

आशा सेन ने बातचीत में 1943 में आईएनए में अपने चार महीने के प्रशिक्षण और बैंकॉक से रंगून तक लंबे पैदल मार्च का स्मरण किया। यह अक्सर खतरों से भरा रहता था। उन्होंने बताया कि मुझे बचपन से ही रोज डायरी लिखने का शौक था। स्कूल और कॉलेज के दौरान भी मैं हर दिन अपनी डायरी  लिखती थी। आशा सेन ने कहा, ‘मैं सिर्फ 16 साल की थी जब मैं आईएनए में शामिल हुई थीं। एक साल बाद ही मैं लेफ्टिनेंट पद तक पहुंच गई थी। हमने प्रशिक्षण के दौरान बंदूकें, पिस्तौल और विमान भेदी मिसाइल चलाना सीखा।’
झांसी रेजिमेंट में इसलिए भर्ती हुईं

स्वतंत्रता सेनानी ने बताया कि जब भी बी-29 अमेरिकी विमान हमारे क्षेत्र में बमबारी के लिए आते तो हम उन पर गोलियां चलाते थे। यह पूछे जाने पर कि वह आजाद हिंद फौज की ‘झांसी की रानी रेजिमेंट’ में ही क्यों शामिल हुईं? उन्होंने कहा, ‘हम बलिदान की भावना से ओत-प्रोत होकर ही बड़े हुए हैं। हम देश की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान करने के लिए तैयार और इच्छुक थे। जब झांसी की रानी रेजिमेंट को बैंकॉक में रखा गया था, तब मैंने अपने पिता से कहा कि वह इस रेजिमेंट में शामिल होना चाहती हैं। नेताजी के जर्मनी से लौटने के बाद उन्होंने मुझे सेना में शामिल होने की अनुमति दी।’

पैर छूने पर नेताजी ने उन्हें फटकारा था

वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी आशा सेन ने एक किस्सा साझा करते हुए कहा कि नेताजी ने उन्हें और उनके साथियों को उनके पैर छूने और झुकने के लिए फटकार लगाई थी। सेन ने कहा कि जैसे ही हम नेताजी के पैर छूने के लिए झुके तो उन्होंने गुस्से में कहा, ‘हमने लंबे समय तक गुलामी झेली है और फिर भी आप …, सीधे खड़े हो जाओ और जय हिंद कहो’

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