School Fees: Parents in trouble due to increased school fees after Corona hit

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School Fees : निजी स्कूलों की फीस बढोतरी को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद राजधानी के स्कूलों ने अभिभावकों को फीस संबंधी निर्देश भेजने शुरू कर दिए हैं। अभिभावकों के लिए यह दोहरी मार की तरह है। कोविड-19 से उपजी स्थिति के बाद यह अभिभावकों के लिए पीड़ादायक है। राजधानी के कई स्कूल अदालत के निर्णय का संदर्भ देते हुए अभिभावकों को पत्र दे रहे हैं और उनसे अतिरिक्त फीस की मांग कर रहे हैं। अभिभावक इसे अन्यायपूर्ण मानते हुए कह रहे हैं कि जब स्कूल में बच्चा जाता ही नहीं है तो हम लोग डेवलेपमेंट फीस क्यों दें।

अभिभावक वकार खान ने बताया कि मेरे तीन बच्चे हैं और तीनों की डेवलेपमेंट फीस और ट्यूशन फीस के अलावा वार्षिक फीस देना मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। कोरोना के कारण व्यापार सीधा प्रभावित हुआ ऐसे में ट्यूशन फीस देना मुश्किल हो रहा है हम वार्षिक फीस कैसे दे पाएंगे। दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय को चुनौती दी जानी चाहिए। मेरे जैसे हजारों अभिभावक हैं जो इस समस्या से जूझ रहे हैं। ऑनलाइन पढ़ाई से स्कूलों का बोझ घटा है जबकि अभिभावकों का बोझ बढ़ा है। क्योंकि मेरे तीन बच्चे हैं तो मुझे तीनों बच्चों के लिए लैपटॉप, टैबलेट या मोबाइल लेनी पड़ेगी। उसके अलावा इंटरनेट की व्यवस्था। जबकि स्कूलों को किसी एक शिक्षक को ही यह सुविधा देनी है। हमारी मांग है कि न्यायालय केा एक बार इसके बारे में सोचना चाहिए।

एक अन्य अभिभावक अतुल शर्मा बताते हैं कि मैंने नौकरी छोड़ अपना व्यापार शुरू किया था लेकिन तभी पिछली साल लॉकडाउन लग गया। मेरे दो बच्चे रोहिणी एक निजी स्कूल में पढ़ते हैं। फीस न देने के कारण मेरे एक बच्चे की ऑनलाइन क्लास का लिंक नहीं दिया जा रहा है। आज मेरे समक्ष रोजी रोटी का संकट है ऐसे में मैं फीस कैसे दे पाऊंगा। इस मामले पर अदालत में विचार किया जाना चाहिए।

आल इंडिया पैरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल का कहना है कि उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार की कार्य शैली पर टिप्पणी की है। जिसका खामियाजा अभिभावक भुगत रहे हैं।

इस बारे में दिल्ली पैरेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष अपराजिता गौतम का कहना है कि उच्च न्यायालय के निर्णय को दिल्ली सरकार ने चुनौती दी है और हम लोग भी इस मामले में न्यायालय का रुख करने जा रहे हैं। आज अभिभावकों के समक्ष अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने के लिए पैसा नहीं है ऐसे में वह बच्चों की अतिरिक्त फीस का बोझ कैसे सह सकते हैं।
 

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