TN Seshan who were not afraid of the government changed the face of elections now supreme court remembers – India Hindi News

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TN Seshan: ‘कई CECs रहे, लेकिन टीएन शेषन कभी कभार ही होता है’ पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने निर्वाचन आयोग के मौजूदा हालात पर चिंता जाहिर की। इस दौरान UPA और NDA दोनों की ही सरकारों पर सवाल उठा दिया है। लेकिन इन सभी के बीच सबसे ज्यादा अहम पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त तिरुनेल्लाई नारायण अय्यर शेषन यानी टीएन शेषण का यह जिक्र रहा। उनके निधन को करीब 3 साल का वक्त हो गया है, लेकिन लगभग 3 दशक पहले किए गए उनके कामों की गूंज देश की सर्वोच्च अदालत में सुनाई दे रही है।

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश को टीएन शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की जरूरत है, जो खुद को कभी दबने नहीं देता। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सुधार को लेकर जस्टिस केएम जोसेफ, अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, ऋषिकेश रॉय और सीटी रविकुमार ने सुनवाई की थी।

पहले समझें कौन थे टीएन शेषन?

केरल के पलक्कड़ में जन्मे टीएन शेषन को 12 दिसंबर 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया था। उनका कार्यकाल 11 दिसंबर 1996 तक का था। आयुक्त बनने से पहले भी वह परमाणु ऊर्जा आयोग के सचिव जैसे कई अहम पदों पर रहे। उन्हें भारत की चुनाव व्यवस्था में सुधार करने वाले के रूप में याद किया जाता है।

बदल दी भारत में चुनावों की तस्वीर

साल 1950 में स्थापित आयोग को भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का जिम्मा दिया गया था। हालांकि, कहा जाता है कि साल 1990 तक आयोग चुनावों के पर्यवेक्षक से ज्यादा कुछ नहीं था। उस दौर में जब मतदाताओं को रिश्वत देना आम बात थी, तब शेषन ने संविधान से आयोग को मिली ताकतों को लागू किया।

उन्होंने भारत में चुनाव की प्रक्रिया को बदल दिया था। साथ ही 150 ऐसे कामों की सूची बनाई थी, जो चुनाव के लिहाज से गलत माने गए। इनमें शराब बांटना, मतदाताओं को रुपये देना, दीवारों पर लिखने पर प्रतिबंध, भाषणों में धार्मिक बातों पर रोक जैसी बातें शामिल थीं। इतना ही नहीं वह पहचान पत्र, आदर्श आचार संहिता भी लेकर आए और चुनाव के खर्चों पर सीमा तय की।

सरकार से डरे नहीं, अवॉर्ड भी जीता

कहा जाता है कि चुनाव प्रक्रिया में सुधारों के दौरान शेषन और सरकार के बीच टकराव भी देखने को मिला। लेकिन अधिकारी की रफ्तार नहीं रुकी और वह काम में जुटे रहे। साल 1996 में उन्हें चुनाव प्रक्रिया में सुधार लाने के लिए ही रैमन मैगसेसे अवॉर्ड भी दिया गया। इसके बाद वह साल 1997 मं राष्ट्रपति पद के लिए भी खड़े हुए, लेकिन केआर नारायण के सामने हार गए।

जब सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए शेषन

बात साल 1993 की है। तब की पीवी नरसिम्हा राव की सरकार एक अध्यादेश लाई, जिसमें दो चुनाव आयुक्तों को लाने की बात कही गई थी। इसे राष्ट्रपति की सहमति भी मिली और एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त बनाया गया। अब इस बात को लेकर शेषन सर्वोच्च अदालत पहुंच गए और आरोप लगा दिए कि यह उनकी ताकतों को कम करने की कोशिश है। हालांकि, उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था। 

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